Tuesday, August 20, 2013

धूप से राह

घनघोर बारिशों के बीच किसी खुले दिन
धूप मेरे घर की खिड्कियों पर आ जाती है
समय के बहते गधेरे में एक राह निकल आती है
उदासियाँ सुरमई धूप की उस नदी में बह जाती हैं

यह सच है कि अंधेरा है
यह सच है कि बुझा-बुझी सा सवेरा है
मन में शंकाओं की बडी आँधी है
फिर भी इक धूप है जो राह दिखा जाती है

कल्पना

Sunday, July 28, 2013

स्वप्न

पहाड एक स्वप्न था
हरी- भरी वादी का
फूलों की घाटी का
श्वेत हंसों का
मेघदूत के मेघ
यक्षों के संदेश
जल प्लावन की कथा
में बह गये और
कठोर यथार्थ पर स्वप्न सारे ढह गये
अब भी जीने का चट्टानी बल लिये
जीता है पहाड
सीने पर पहाड
राजनीति की बंदरबाँट
राहत पर किसी तीसरे की आँख






Monday, June 3, 2013

इस बारि्श में





इस बारि्श में
  जब तुम अपने काम पर झुके हुए सूफी संगीत सुन रहे हो
तब बरसती बारिश मे
मैं अपनी नींद
मीठी नीम के नीचे रख आयी हूँ
ठीक उन दिनों के उस बरसते दिन की तरह
लम्हा-लम्हा बहती
शिलाओं से टकराती जाती जिंदगी
आओ!
इस संगीत के साथ
कुछ देर बैठें
बारिश में

Monday, May 13, 2013

हमारी चुप्पी



उन्हें नाराज नहीं करना था इसलिए ये चुप्पी थी
वे हर जगह मौजूद थे
हर गोरखधंधे में उनकी जगह थी
वे कानून में थे
जेल की चहारदिवारी के भीतरभी
हर दफ्तर की कुर्सी में थे
कागज कलम और चश्मे में भी
हर पेड पर इंजेक्शन से पनपे फलों की तरह
और लताओं में लम्बोतरी गोल- मटोल सब्जियों की तरह थे
दुकानों मेंथे
मकानों में थे
स्विस बैंक के अकाउंट में मजबूत थे
तिजोरियों के तालों में थे
शीर्ष पर सफेद परिधानों और
मुस्कुराहटों के साथ थे
उनकी कई जोडी आँखें थी
हजारों पाँव थे
हम उन्हें चुनते थे
वे हमें चुगते थे
उन्हें महत्वपूर्ण धंधे संभालने थे
और हम अर्थहीन थे
हम उनकी जमीन थे
और खुद बेजमीन थे
वे आसमानों की सैर करते
और हम एकटक आसमान से बरसने की गुहार करते
और इस तरह दिन बीतते गये
वे पनपते गये और
हम रीतते गये................
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कल्पना

Friday, April 19, 2013

खुद में खुद को पा जीने की ताकत आयी है

बहुत सालों बाद कोई दस्तक वहाँ से आयी है
पर खामोश है हम क्योंकि तन्हाई की आदत पायी है
कभी एक दिल था अब दर्दे जिगर हुआ
इक जख्म था अब नासूर की सूरत पाई है
इन दिनों तन्हाई ही हमें सुहाई है......
अब सफर है कारवाँ है मन्जिल की उम्मीद भी है
पर मन्जिल को पाने की ह्ठ हमने बिसराई है.
भरी है मश्क और सामने दरिया भी है
पर सवार को अब धुन कोई और समाई है
यूँ ही सब्र है सुकून है और बेपरवाही है
खुद में खुद को पा जीने की ताकत आयी है
         कल्पना

Wednesday, March 6, 2013

शब्द पर शब्द बरसते रहे और मैं शब्दों के सिरहाने सो गयी. सुबह उठी तो शब्दों ने होले से मुझे और मैं जान गयी कि मुझे शब्दों की दुनिया से किन शब्दों को चुनना है, गुनना है और फिर बुनना है.जान गयी कि मुझे क्या करना है. अजीब दिन हैं. दुनिया अजीब तरह के षड्यंत्रों का जाल बुनती है. दोस्तों के चेहरों पर मुखौटे नजर आते हैं . फिर भी मैं मुस्कुराती हूँ तपाक से हाथ मिलाती हूँ. कितनी बनावट और जियूँगी मैं.मेरी पीठ पर कटार है और तिसपर भी कटार रखने वाले के लिये मेरे चेहरे पर एक मीठी मुस्कान है और कटार रखने वाले का चेहरा बीमार है. वाह सब बाजारहै वाह सब बाजार है...................

Sunday, March 3, 2013

 क्या फर्क पड्ता है कि हमारा खून जलेगा


हैदराबाद
और फिर कोइ नयाबाद
तुम्हें मुबारक
सत्तासीनों!
राजनीति को नया परचम मिलेगा
क्या फर्क पड्ता है कि
हमारा खून जलेगा
फिर-फिर बेगुनाहों का लहू बहेगा
तुम्हें मुबारक
एक नया नारा मिलेगा
हमारी रात होगी
तुम्हारा दिन खिलेगा.....

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